Saturday, February 21, 2026

सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम


सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम



भारतीय समाज में परिवार को हमेशा से एक पवित्र और आवश्यक संस्था माना गया है। परंपरागत सोच में परिवार की परिकल्पना प्रायः “माता-पिता और संतान” के रूप में की जाती रही है, जहाँ पिता को संरक्षक और परिवार का मुखिया माना गया। किंतु समय के साथ सामाजिक संरचनाएँ बदली हैं—एकल परिवार बढ़े हैं, तलाक और अलगाव की घटनाएँ सामने आई हैं, विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में “सिंगल मदर” यानी अकेले अपने बच्चे का पालन-पोषण करने वाली माँ की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता थी।


हाल में न्यायपालिका द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि यदि कोई माँ अकेले अपने बच्चे का पालन-पोषण कर रही है, तो उसे “पूर्ण अभिभावक” (Full Guardian) के रूप में मान्यता मिल सकती है और बच्चे के दस्तावेज़ों से पिता का नाम हटाने या दर्ज न करने का अधिकार विशेष परिस्थितियों में दिया जा सकता है। यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है—जो नारी समानता, गरिमा और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करता है।





सिंगल मदर: एक सामाजिक यथार्थ



भारत में सिंगल मदर की स्थिति विविध कारणों से उत्पन्न होती है—पति का निधन, तलाक, अलगाव, घरेलू हिंसा, परित्याग, या विवाह के बिना मातृत्व का निर्णय। कई बार महिलाएँ सामाजिक दबाव, आर्थिक चुनौतियों और कानूनी उलझनों के बीच अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। वे न केवल माँ की भूमिका निभाती हैं, बल्कि पिता की जिम्मेदारियाँ भी स्वयं संभालती हैं—आर्थिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर।


इसके बावजूद, लंबे समय तक सरकारी दस्तावेज़ों, स्कूल रिकॉर्ड, पासपोर्ट, बैंक खाते या अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं में पिता का नाम अनिवार्य रूप से माँगा जाता रहा। यह व्यवस्था अनजाने में सिंगल मदर्स और उनके बच्चों के लिए मानसिक पीड़ा और सामाजिक असहजता का कारण बनती थी। बच्चे को बार-बार यह समझाना पड़ता था कि उसके पिता क्यों उपस्थित नहीं हैं, और माँ को अपनी निजी परिस्थितियाँ सार्वजनिक करनी पड़ती थीं।





न्यायिक दृष्टिकोण: गरिमा और निजता का अधिकार



न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे की पहचान केवल पिता से नहीं जुड़ी होती। माँ भी समान रूप से अभिभावक है और संविधान ने उसे समान अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


यदि कोई माँ यह साबित कर सके कि वह अकेले बच्चे की देखभाल कर रही है और पिता का उल्लेख बच्चे के हित में नहीं है—तो उसे अभिभावक के रूप में पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए। यह निर्णय माँ की निजता (Right to Privacy) और गरिमा (Dignity) की रक्षा करता है।


यह मान्यता समाज को यह संदेश देती है कि मातृत्व किसी भी तरह से पितृत्व से कम नहीं है। यदि एक महिला अपने दम पर बच्चे का पालन-पोषण कर रही है, तो उसे किसी दूसरे नाम की आवश्यकता नहीं है अपनी पहचान स्थापित करने के लिए।





नारी समानता का आयाम



नारी समानता का अर्थ केवल शिक्षा या नौकरी में बराबरी नहीं है। यह उस मानसिक ढाँचे को बदलने की प्रक्रिया है जिसमें महिला को हमेशा किसी पुरुष के साथ जोड़ा जाता है—किसी की बेटी, पत्नी या माँ के रूप में। जब न्यायालय यह कहता है कि सिंगल मदर भी पूर्ण अभिभावक है, तो वह इस सोच को चुनौती देता है कि महिला अकेले अधूरी है।


यह निर्णय निम्नलिखित बिंदुओं पर नारी समानता को सुदृढ़ करता है—


  1. स्वायत्तता (Autonomy): महिला को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है—चाहे वह विवाह करे या न करे, मातृत्व स्वीकार करे या नहीं।
  2. कानूनी पहचान: माँ की पहचान स्वतंत्र रूप से मान्य है; उसे पिता के नाम के सहारे की आवश्यकता नहीं।
  3. सामाजिक सम्मान: सिंगल मदर होना कोई “अपूर्णता” नहीं, बल्कि साहस और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
  4. बच्चे का हित सर्वोपरि: बच्चे की मानसिक शांति और गरिमा को प्राथमिकता दी गई है।






सामाजिक पूर्वाग्रह और चुनौतियाँ



हालाँकि न्यायालय का निर्णय प्रगतिशील है, परंतु समाज में मानसिक परिवर्तन अभी शेष है। कई स्थानों पर सिंगल मदर्स को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उनकी नैतिकता पर प्रश्न उठाए जाते हैं, या उन्हें “बेचारी” समझा जाता है। यह दृष्टिकोण बदलना आवश्यक है।


शिक्षण संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में भी संवेदनशीलता का अभाव दिखता है। फॉर्म में अनिवार्य रूप से “पिता का नाम” भरने की शर्त, सिंगल मदर्स के लिए परेशानी का कारण बनती है। प्रशासनिक तंत्र को अब इस न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपने नियमों में संशोधन करना होगा।





आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलू



सिंगल मदर के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक स्थिरता होती है। वह अकेले कमाती है, घर संभालती है और बच्चे की शिक्षा-स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाती है। कई बार उसे अतिरिक्त काम करना पड़ता है, जिससे मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है।


बच्चे के लिए भी सामाजिक प्रश्नों का सामना करना आसान नहीं होता। स्कूल में साथियों के प्रश्न, रिश्तेदारों की जिज्ञासा—ये सब बच्चे के मन पर प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए परिवार और समाज का सहयोग आवश्यक है।


यदि समाज सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाए, तो सिंगल मदर और उसका बच्चा आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकते हैं। 

बदलती पारिवारिक संरचना और नई सोच



आज के समय में परिवार की परिभाषा बदल रही है। एकल अभिभावक परिवार, दत्तक ग्रहण, सरोगेसी, और विवाह के बिना मातृत्व—ये सब आधुनिक समाज की वास्तविकताएँ हैं। कानून और समाज को इन परिवर्तनों को स्वीकार करना होगा।


जब हम कहते हैं कि “माँ ही प्रथम गुरु है”, तो हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि वह अकेले भी अपने बच्चे को संस्कार, शिक्षा और आत्मबल दे सकती है।


यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक सोच अब धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। महिला केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि नेतृत्व के और निर्णायक भूमिका में भी है।


शिक्षा और जागरूकता की भूमिका


नारी समानता को व्यवहार में लाने के लिए केवल न्यायिक आदेश पर्याप्त नहीं हैं। समाज में व्यापक जागरूकता अभियान की आवश्यकता है।


  • स्कूलों में संवेदनशीलता पर आधारित शिक्षा दी जाए।
  • सरकारी फॉर्म और नीतियों में “अभिभावक 1” और “अभिभावक 2” जैसे विकल्प दिए जाएँ।
  • मीडिया सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करे, जहाँ सिंगल मदर को सशक्त रूप में दिखाया जाए । 

आप स्वयं एक मीडिया विशेषज्ञ रही हैं, इसलिए भली-भाँति जानती हैं कि जनसंचार माध्यम सामाजिक सोच को दिशा देने में कितना प्रभावशाली होते हैं। यदि मीडिया सिंगल मदर को संघर्षशील, आत्मनिर्भर और सम्माननीय रूप में प्रस्तुत करे, तो समाज में स्वीकार्यता बढ़ेगी। 



संवैधानिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि

यह निर्णय भारतीय संविधान की आत्मा को पुनः स्थापित करता है। समानता, गरिमा और स्वतंत्रता—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आधारशिला हैं।

जब एक महिला अपने बच्चे के लिए पूर्ण अभिभावक मानी जाती है, तो यह संविधान की उस भावना को साकार करता है जिसमें नागरिक की पहचान उसके लिंग से परे होती है।

यह भी स्पष्ट होता है कि कानून अब समाज के बदलते स्वरूप के साथ कदम मिला रहा है।


आगे की राह

यद्यपि यह निर्णय ऐतिहासिक है, फिर भी कुछ कदम और आवश्यक हैं—

  1. सभी राज्यों में एक समान दिशानिर्देश लागू हों।
  2. सरकारी विभागों में प्रशिक्षण दिया जाए ताकि सिंगल मदर्स को अनावश्यक कागजी परेशानियों का सामना न करना पड़े।
  3. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सिंगल मदर्स को विशेष सहायता दी जाए।
  4. मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और सपोर्ट समूह विकसित किए जाएँ।

सिंगल मदर को “पूर्ण अभिभावक” की मान्यता मिलना केवल एक महिला की जीत नहीं, बल्कि समूची नारी जाति की गरिमा का सम्मान है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि मातृत्व किसी भी सामाजिक ढाँचे से परे एक पूर्ण और सशक्त पहचान है।

नारी समानता का अर्थ है—महिला को उसके निर्णयों, उसकी परिस्थितियों और उसकी क्षमता के आधार पर स्वीकार करना। जब समाज यह स्वीकार कर लेगा कि एक माँ अकेले भी संपूर्ण है, तभी वास्तविक समानता संभव होगी।

आज आवश्यकता है कि हम सिंगल मदर्स को सहानुभूति नहीं, सम्मान दें; दया नहीं, अधिकार दें; प्रश्न नहीं, सहयोग दें। तभी हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकेंगे जहाँ हर महिला—चाहे वह विवाहित हो, अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा—अपनी पहचान और अपने अधिकारों के साथ गरिमापूर्ण जीवन जी सके।

यह निर्णय भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक संदेश है, कि समानता केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारा जाने वाला सत्य है। और जब यह सत्य समाज में स्थापित होगा, तभी भारत सचमुच एक समतामूलक राष्ट्र कहलाएगा।

©️रेणु जुनेजा ✍️

Thursday, February 12, 2026

भारत की राष्ट्रीय नीति

(विशेष लेख)


विश्व राजनीति के दबाव और भारत की राष्ट्रीय नीति: संतुलन की कठिन परीक्षा 


इक्कीसवीं सदी की राजनीति केवल सीमाओं की राजनीति नहीं रह गई है। आज विश्व के किसी कोने में घटने वाली घटना भारत की संसद, बाज़ार और आम नागरिक की रसोई तक असर डालती है। ऐसे समय में यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्व राजनीति भारत की राष्ट्रीय नीति को किस तरह प्रभावित कर रही है, और भारत इन दबावों का सामना किस सोच के साथ कर रहा है।

बदलती विश्व व्यवस्था: स्थिरता का भ्रम टूट चुका है

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस स्थिर विश्व की कल्पना की गई थी, वह अब इतिहास बन चुकी है। आज की विश्व राजनीति बहुध्रुवीय है, जहाँ हर शक्ति अपने हितों को सर्वोपरि रख रही है।

अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक व्यापार और तकनीक को दो खेमों में बाँट दिया है। रूस–यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संस्थाएँ सैन्य शक्ति के आगे अक्सर असहाय हो जाती हैं। मध्य-पूर्व की लगातार अस्थिरता ने ऊर्जा सुरक्षा को वैश्विक संकट बना दिया है।

यह सब केवल दूर की खबरें नहीं हैं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय नीति के लिए सीधी चुनौतियाँ हैं।

आर्थिक दबाव: जब युद्ध महँगाई बनकर घर में घुस आता है

रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह आर्थिक चेतावनी थी। महँगाई बढ़ी, परिवहन महँगा हुआ और आम आदमी की थाली प्रभावित हुई।

भारत की राष्ट्रीय नीति का यहाँ व्यावहारिक पक्ष सामने आया। सरकार ने सैद्धांतिक रुख़ छोड़कर रूस से सस्ता तेल खरीदा, जिससे घरेलू बाज़ार को राहत मिली। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश बढ़ाकर भविष्य की निर्भरता कम करने की कोशिश की गई। यह उदाहरण दिखाता है कि आज की राष्ट्रीय नीति भावनाओं से नहीं, ज़रूरतों से संचालित होती है।

सुरक्षा और भू-राजनीति: सीमा से संसद तक असर

चीन के साथ सीमा तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ भारत की सुरक्षा नीति के केंद्र में हैं। रक्षा बजट में वृद्धि, स्वदेशी हथियार निर्माण और रणनीतिक साझेदारियाँ—ये सभी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की प्रतिक्रिया हैं।

क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता यह संकेत देती है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह राष्ट्रीय नीति का वह मोड़ है जहाँ कूटनीति और सैन्य तैयारी साथ-साथ चलती हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता: दबावों के बीच निर्णय की आज़ादी

अमेरिका और यूरोप चाहते हैं कि भारत वैश्विक विवादों में स्पष्ट पक्ष ले, जबकि रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार रहा है। ऐसे दबावों में भारत ने किसी भी गुट का स्थायी सदस्य बनने से इंकार किया।

“रणनीतिक स्वायत्तता” भारत की राष्ट्रीय नीति की रीढ़ बन चुकी है। यह नीति भारत को निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है और बताती है कि राष्ट्रीय हित किसी वैश्विक दबाव से ऊपर हैं।

जलवायु राजनीति: नैतिकता बनाम यथार्थ

जलवायु परिवर्तन आज विश्व राजनीति का नैतिक प्रश्न बना दिया गया है, लेकिन इसका बोझ अक्सर विकासशील देशों पर डाला जाता है। भारत ने स्पष्ट कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में है, पर विकास और रोज़गार की कीमत पर नहीं।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश यह दिखाता है कि भारत समाधान का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन असमान वैश्विक जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं करता।

राष्ट्रीय राजनीति में वैश्विक विमर्श

आज भारत की राष्ट्रीय राजनीति में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिली सफलता चुनावी मुद्दा बनती है। जी-20 की अध्यक्षता हो या वैश्विक बैठकों में भारत की भूमिका—इन सबको राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा जाता है।

विपक्ष इन नीतियों के दीर्घकालिक परिणामों पर सवाल उठाता है। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है, जहाँ वैश्विक मुद्दे घरेलू बहस का हिस्सा बनते हैं।

मीडिया और जनचेतना: सबसे बड़ी जिम्मेदारी

मीडिया यदि विश्व राजनीति को केवल राष्ट्रवादी उत्तेजना के रूप में पेश करता है, तो समझ की जगह शोर पैदा होता है। विशेष लेखन का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह भावनाओं के पार जाकर तथ्यों और प्रभावों को सामने रखे।

जनसामान्य जितना समझदार होगा, राष्ट्रीय नीति उतनी ही मज़बूत होगी।

संतुलन ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति

विश्व राजनीति के इस अस्थिर दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—संतुलन बनाए रखना।

न तो आँख मूँदकर किसी वैश्विक शक्ति के पीछे चलना, न ही दुनिया से कटकर आत्मनिर्भरता का भ्रम पालना।

एक दूरदर्शी, व्यावहारिक और जनहित आधारित राष्ट्रीय नीति ही भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान और देश के भीतर स्थिरता दे सकती है।

भारत की असली परीक्षा यही है—दबावों में झुकना नहीं, और अवसरों को पहचानना।

©️रेणु जुनेजा ✍️

Monday, February 9, 2026

न्याय की परिभाषाःधान्या को नये अवसर


न्याय की दृष्टि: धान्या और समान अवसर की नई परिभाषा


केरल की धान्या नायर का सिविल जज बनना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में समावेशन की एक ऐतिहासिक घोषणा है। दृष्टिबाधित होने के बावजूद धान्या ने वह कर दिखाया, जिसे व्यवस्था लंबे समय तक “असंभव” मानती रही।

कानून की पढ़ाई के दौरान ही धान्या को यह एहसास हो गया था कि चुनौती उनकी अक्षमता नहीं, बल्कि समाज और संस्थानों की संकीर्ण सोच है। स्क्रीन रीडिंग सॉफ़्टवेयर, ब्रेल लिपि और असाधारण आत्मविश्वास के सहारे उन्होंने न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन नियुक्ति के रास्ते में नियमों की दीवार खड़ी कर दी गई।

मामला न्यायालय पहुँचा। और यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया।

मार्च 2025 में आए फ़ैसले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि दृष्टिबाधिता न्यायिक पद के निर्वहन में स्वाभाविक बाधा नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक के इस युग में दिव्यांगता को अयोग्यता का पर्याय मानना संविधान की समानता की भावना के विपरीत है।


धान्या का चयन यह साबित करता है कि योग्यता आँखों से नहीं, दृष्टि से तय होती है—और वह दृष्टि मन, विवेक और संवेदना से आती है। यह फ़ैसला उन हज़ारों दिव्यांग युवाओं के लिए आशा का दीपक है, जो आज भी अवसरों के द्वार पर खड़े हैं।


धान्या अब सिर्फ़ एक जज नहीं हैं—वे न्याय की उस आँख की तरह हैं, जो देखकर नहीं, समझकर फ़ैसला करती है।


समीक्षा नाटक -मिथ्याचार

मिथ्यासुर 

(।             (नाटक समीक्षा)

 


                  फ़ोटो तो हम ले नहीं पाये । 


कल यानि बीते कल आर आई सी में देखा नाटक मिथ्यासुर 

कुछ देखने या पढ़ने के बाद जब तक उसे उगल ना दें तब तक 

अपच सा रहता । अपच उन्हीं कृतियों पर होता है जो मस्तिष्क पर

छाप छोड़ जाती हैं और उसका प्रभाव मन पर तब तक रहता जब तक 

कलम से काग़ज़ पर उतार लें । तो लीजिए आप भी समीक्षा के माध्यम से नाटक का मज़ा लीजिए अगर ले पायें तो । 


नाटक ‘मिथ्यासुर’ अपने शीर्षक से ही संकेत दे देता है कि यह किसी पौराणिक कथा का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि हमारे समय के उस अदृश्य असुर की कहानी है, जो झूठ, भ्रम और आधे-सच के सहारे समाज की चेतना पर हावी होता जा रहा है। यह एक समकालीन सामाजिक–राजनीतिक नाटक है, जो दर्शक को मनोरंजन से अधिक आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है।

इस नाटक के लेखक एवं निर्देशक अजीत सिंह पलावत हैं, और निर्देशन में उनकी स्पष्ट वैचारिक दृष्टि पूरे नाटक में महसूस की जा सकती है। पलावत ने कथा, संवाद और मंच-गतियों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि ‘मिथ्यासुर’ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सोच, एक व्यवस्था और एक सामूहिक चूक का परिणाम है।

कथ्य और विचार

‘मिथ्यासुर’ उस प्रक्रिया को मंच पर लाता है, जिसमें झूठ बार-बार दोहराए जाने से सच का रूप ले लेता है। सत्ता, भाषा और भीड़ के गठजोड़ से कैसे एक कृत्रिम नैतिकता गढ़ी जाती है — नाटक इसी विडंबना को उजागर करता है।

यह नाटक सवाल उठाता है कि जब झूठ सुविधा बन जाए और सच असुविधा, तब समाज किस ओर खड़ा होता है?

पात्र और अभिनय

नाटक के पात्र प्रतीकात्मक हैं, परंतु मानवीय भी।

मिथ्यासुर का चरित्र प्रभावी ढंग से उभरता है — वह आक्रामक नहीं, बल्कि आकर्षक है; चीखता नहीं, बल्कि समझाता है।

आम नागरिक का पात्र दर्शक का प्रतिबिंब बनता है, जो भ्रम, डर और आत्मग्लानि के बीच झूलता रहता है।


कलाकारों की टोली ने सामूहिक रूप से नाटक के विचार को ईमानदारी से मंच पर रखा है। विशेष रूप से संवाद-प्रस्तुति और कोरस के प्रयोग में कलाकारों का अनुशासन और ऊर्जा सराहनीय है। अभिनय कहीं भी प्रदर्शन-प्रधान नहीं होता, बल्कि कथ्य के साथ चलता है — जो निर्देशक की स्पष्ट पकड़ को दर्शाता है।

भाषा और मंच-व्यवस्था

नाटक की भाषा सरल, सीधी और व्यंग्यात्मक है। कई संवाद दर्शक को असहज करते हैं, लेकिन यही उनकी सार्थकता है।

मंच-सज्जा न्यूनतम है, पर प्रकाश और ध्वनि के प्रयोग से वातावरण सशक्त बनता है। दृश्य-परिवर्तन तेज़ हैं, जो आज के समय की बेचैनी और जल्दबाज़ी को रेखांकित करते हैं। 

मंचन और प्रस्तुति

न्यूनतम मंच-सज्जा के बावजूद प्रकाश, ध्वनि और कोरस का प्रयोग प्रभावी है। दृश्य परिवर्तन तेज़ हैं, जो समय की हड़बड़ी और विचारों की आपाधापी को रेखांकित करते हैं।

अभिनय में आक्रामकता और संयम का संतुलन दिखाई देता है, विशेषकर मिथ्यासुर के पात्र में।

प्रभाव

‘मिथ्यासुर’ मनोरंजन के लिए नहीं देखा जाता।

यह नाटक दर्शक को सहज नहीं छोड़ता।

नाटक समाप्त होने के बाद भी उसके प्रश्न दर्शक के साथ चलते हैं — घर तक, आत्मा तक।

‘मिथ्यासुर’ हमारे समय का ज़रूरी नाटक है।

यह हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाता, बल्कि हमें हमारे ही सवालों के सामने खड़ा कर देता है।

यह नाटक बताता है कि असुर का वध तलवार से नहीं होता , 

वह तब मरता है, जब समाज सच को पहचानने का साहस करता है।

मिथ्यासुर बाहर नहीं, भीतर है —

और यही इस नाटक की सबसे बड़ी सच्चाई है। 

Wednesday, February 4, 2026

न्याय का पक्ष जाति से व्यापक हो

 न्याय का प्रश्न: जाति से आगे व्यापक हो 


इन दिनों यूजीसी के नए Equity Regulations को लेकर देश-भर में बहस तेज़ है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। सतह पर यह विवाद “सवर्ण बनाम आरक्षित वर्ग” जैसा दिखता है, लेकिन भीतर उतरें तो यह बहस कहीं अधिक गहरी है — यह समानता, सामाजिक न्याय और व्यक्ति की गरिमा के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

एक तरफ़ सरकार और समर्थक वर्ग का तर्क है कि विश्वविद्यालय परिसरों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों के साथ भेदभाव की वास्तविक शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए उनके लिए विशेष संरक्षण और संस्थागत तंत्र ज़रूरी है। दूसरी ओर सामान्य श्रेणी के छात्र और कई सामाजिक समूह यह कह रहे हैं कि नए नियम “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को सीमित कर देते हैं, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को वही अधिकार और सुरक्षा स्पष्ट रूप से नहीं मिलती।

असल सवाल यही है — क्या न्याय समूहों के आधार पर तय होना चाहिए, या इससे व्यापक !! 


आज का भारत वह भारत नहीं है जहाँ हर सवर्ण संपन्न हो और हर आरक्षित वर्ग का छात्र असहाय। ज़मीनी सच्चाई कहीं अधिक जटिल है। आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मण भी हैं, सामाजिक रूप से सशक्त ओबीसी भी, संघर्षरत एससी-एसटी छात्र भी, और विशेषाधिकार प्राप्त सामान्य वर्ग के विद्यार्थी भी। हर श्रेणी के भीतर हर प्रकार के लोग मौजूद हैं।


इसलिए यह मान लेना कि अन्याय केवल किसी एक वर्ग के साथ ही हो सकता है, आधुनिक समाज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।

संविधान ने ऐतिहासिक अन्याय को ध्यान में रखते हुए कुछ समुदायों के लिए विशेष प्रावधान किए — यह आवश्यक भी था। लेकिन साथ ही संविधान का मूल ढांचा व्यक्ति को केंद्र में रखता है। अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की बात करता है, अनुच्छेद 15 भेदभाव से रोकता है, और अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। ये अधिकार किसी एक श्रेणी के लिए नहीं, हर नागरिक के लिए हैं।


यहीं मौजूदा विवाद की जड़ है।


यदि कोई सामान्य श्रेणी का छात्र मानसिक उत्पीड़न झेलता है, अपमानित होता है, या उसे संस्थागत स्तर पर नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो क्या उसका दर्द कम वैध हो जाता है? क्या उसके पास शिकायत करने का उतना ही सशक्त तंत्र होना चाहिए या नहीं? लोकतंत्र का उत्तर साफ़ होना चाहिए — न्याय का अधिकार सबका है।


आज भेदभाव सिर्फ जाति तक सीमित नहीं रहा। आर्थिक स्थिति, भाषा, क्षेत्र, डिजिटल पहुँच, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक नेटवर्क — ये सब नए विभाजक बन चुके हैं। विश्वविद्यालय परिसरों में असमानता बहु-स्तरीय है। ऐसे में केवल जाति के चश्मे से पूरे शैक्षणिक अनुभव को देखना अधूरा विश्लेषण होगा।

यह कहना भी ज़रूरी है कि आरक्षित वर्गों के खिलाफ भेदभाव की घटनाएँ वास्तविक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन समाधान “कुछ के लिए व्यवस्था, कुछ के लिए नहीं” में नहीं छिपा है। समाधान संतुलन में है।


शायद सही रास्ता “caste-exclusive” व्यवस्था नहीं, बल्कि “caste-sensitive” व्यवस्था है।


अर्थात — शिकायत का अधिकार हर छात्र के लिए खुला हो, लेकिन ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के मामलों में अतिरिक्त संवेदनशीलता और सतर्कता बरती जाए। जांच प्रक्रिया निष्पक्ष हो, झूठी शिकायतों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान हों, और हर विद्यार्थी को यह भरोसा मिले कि उसकी बात सुनी जाएगी — चाहे वह किसी भी श्रेणी से हो।

सुप्रीम कोर्ट के सामने आज यही चुनौती है: सामाजिक न्याय और प्रक्रियागत न्याय के बीच संतुलन कैसे बने। संभव है अदालत नियमों को पूरी तरह खारिज न करे, बल्कि उन्हें अधिक समावेशी बनाने का रास्ता दिखाए ताकि वंचित वर्गों की सुरक्षा भी बनी रहे और कोई दूसरा वर्ग स्वयं को कानून से बाहर महसूस न करे।


दरअसल यह मामला केवल यूजीसी नियमों का नहीं है। यह उस भारत की दिशा तय करेगा जिसे हम बनाना चाहते हैं — जहाँ पहचान समूहों से तय होती है, या जहाँ व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि होती है।


आज किसी भी जाति के लोग पूरी तरह कमजोर या पूरी तरह सशक्त नहीं हैं। हर श्रेणी में संघर्षरत भी हैं और विशेषाधिकार प्राप्त भी। ऐसे समय में न्याय की व्यवस्था का केंद्र “जाति” नहीं, “मनुष्य” होना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।

©️रेणु जुनेजा ✍️

सोनम वांगचुक की रिहाई

​ सोनम वांगचुक की रिहाई :   लोकतंत्र, आंदोलन और सत्ता  *समाधान बातचीत से ही *                                     हाल ही में लद्दाख के प्रसि...