मिथ्यासुर
(। (नाटक समीक्षा)
फ़ोटो तो हम ले नहीं पाये ।
कल यानि बीते कल आर आई सी में देखा नाटक मिथ्यासुर
कुछ देखने या पढ़ने के बाद जब तक उसे उगल ना दें तब तक
अपच सा रहता । अपच उन्हीं कृतियों पर होता है जो मस्तिष्क पर
छाप छोड़ जाती हैं और उसका प्रभाव मन पर तब तक रहता जब तक
कलम से काग़ज़ पर उतार लें । तो लीजिए आप भी समीक्षा के माध्यम से नाटक का मज़ा लीजिए अगर ले पायें तो ।
नाटक ‘मिथ्यासुर’ अपने शीर्षक से ही संकेत दे देता है कि यह किसी पौराणिक कथा का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि हमारे समय के उस अदृश्य असुर की कहानी है, जो झूठ, भ्रम और आधे-सच के सहारे समाज की चेतना पर हावी होता जा रहा है। यह एक समकालीन सामाजिक–राजनीतिक नाटक है, जो दर्शक को मनोरंजन से अधिक आत्ममंथन के लिए बाध्य करता है।
इस नाटक के लेखक एवं निर्देशक अजीत सिंह पलावत हैं, और निर्देशन में उनकी स्पष्ट वैचारिक दृष्टि पूरे नाटक में महसूस की जा सकती है। पलावत ने कथा, संवाद और मंच-गतियों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि ‘मिथ्यासुर’ कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सोच, एक व्यवस्था और एक सामूहिक चूक का परिणाम है।
कथ्य और विचार
‘मिथ्यासुर’ उस प्रक्रिया को मंच पर लाता है, जिसमें झूठ बार-बार दोहराए जाने से सच का रूप ले लेता है। सत्ता, भाषा और भीड़ के गठजोड़ से कैसे एक कृत्रिम नैतिकता गढ़ी जाती है — नाटक इसी विडंबना को उजागर करता है।
यह नाटक सवाल उठाता है कि जब झूठ सुविधा बन जाए और सच असुविधा, तब समाज किस ओर खड़ा होता है?
पात्र और अभिनय
नाटक के पात्र प्रतीकात्मक हैं, परंतु मानवीय भी।
मिथ्यासुर का चरित्र प्रभावी ढंग से उभरता है — वह आक्रामक नहीं, बल्कि आकर्षक है; चीखता नहीं, बल्कि समझाता है।
आम नागरिक का पात्र दर्शक का प्रतिबिंब बनता है, जो भ्रम, डर और आत्मग्लानि के बीच झूलता रहता है।
कलाकारों की टोली ने सामूहिक रूप से नाटक के विचार को ईमानदारी से मंच पर रखा है। विशेष रूप से संवाद-प्रस्तुति और कोरस के प्रयोग में कलाकारों का अनुशासन और ऊर्जा सराहनीय है। अभिनय कहीं भी प्रदर्शन-प्रधान नहीं होता, बल्कि कथ्य के साथ चलता है — जो निर्देशक की स्पष्ट पकड़ को दर्शाता है।
भाषा और मंच-व्यवस्था
नाटक की भाषा सरल, सीधी और व्यंग्यात्मक है। कई संवाद दर्शक को असहज करते हैं, लेकिन यही उनकी सार्थकता है।
मंच-सज्जा न्यूनतम है, पर प्रकाश और ध्वनि के प्रयोग से वातावरण सशक्त बनता है। दृश्य-परिवर्तन तेज़ हैं, जो आज के समय की बेचैनी और जल्दबाज़ी को रेखांकित करते हैं।
मंचन और प्रस्तुति
न्यूनतम मंच-सज्जा के बावजूद प्रकाश, ध्वनि और कोरस का प्रयोग प्रभावी है। दृश्य परिवर्तन तेज़ हैं, जो समय की हड़बड़ी और विचारों की आपाधापी को रेखांकित करते हैं।
अभिनय में आक्रामकता और संयम का संतुलन दिखाई देता है, विशेषकर मिथ्यासुर के पात्र में।
प्रभाव
‘मिथ्यासुर’ मनोरंजन के लिए नहीं देखा जाता।
यह नाटक दर्शक को सहज नहीं छोड़ता।
नाटक समाप्त होने के बाद भी उसके प्रश्न दर्शक के साथ चलते हैं — घर तक, आत्मा तक।
‘मिथ्यासुर’ हमारे समय का ज़रूरी नाटक है।
यह हमें किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचाता, बल्कि हमें हमारे ही सवालों के सामने खड़ा कर देता है।
यह नाटक बताता है कि असुर का वध तलवार से नहीं होता ,
वह तब मरता है, जब समाज सच को पहचानने का साहस करता है।
मिथ्यासुर बाहर नहीं, भीतर है —
और यही इस नाटक की सबसे बड़ी सच्चाई है।
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