न्याय की दृष्टि: धान्या और समान अवसर की नई परिभाषा
केरल की धान्या नायर का सिविल जज बनना केवल एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में समावेशन की एक ऐतिहासिक घोषणा है। दृष्टिबाधित होने के बावजूद धान्या ने वह कर दिखाया, जिसे व्यवस्था लंबे समय तक “असंभव” मानती रही।
कानून की पढ़ाई के दौरान ही धान्या को यह एहसास हो गया था कि चुनौती उनकी अक्षमता नहीं, बल्कि समाज और संस्थानों की संकीर्ण सोच है। स्क्रीन रीडिंग सॉफ़्टवेयर, ब्रेल लिपि और असाधारण आत्मविश्वास के सहारे उन्होंने न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन नियुक्ति के रास्ते में नियमों की दीवार खड़ी कर दी गई।
मामला न्यायालय पहुँचा। और यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया।
मार्च 2025 में आए फ़ैसले में न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि दृष्टिबाधिता न्यायिक पद के निर्वहन में स्वाभाविक बाधा नहीं है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि तकनीक के इस युग में दिव्यांगता को अयोग्यता का पर्याय मानना संविधान की समानता की भावना के विपरीत है।
धान्या का चयन यह साबित करता है कि योग्यता आँखों से नहीं, दृष्टि से तय होती है—और वह दृष्टि मन, विवेक और संवेदना से आती है। यह फ़ैसला उन हज़ारों दिव्यांग युवाओं के लिए आशा का दीपक है, जो आज भी अवसरों के द्वार पर खड़े हैं।
धान्या अब सिर्फ़ एक जज नहीं हैं—वे न्याय की उस आँख की तरह हैं, जो देखकर नहीं, समझकर फ़ैसला करती है।
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