न्याय का प्रश्न: जाति से आगे व्यापक हो
इन दिनों यूजीसी के नए Equity Regulations को लेकर देश-भर में बहस तेज़ है। मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच चुका है। सतह पर यह विवाद “सवर्ण बनाम आरक्षित वर्ग” जैसा दिखता है, लेकिन भीतर उतरें तो यह बहस कहीं अधिक गहरी है — यह समानता, सामाजिक न्याय और व्यक्ति की गरिमा के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।
एक तरफ़ सरकार और समर्थक वर्ग का तर्क है कि विश्वविद्यालय परिसरों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के छात्रों के साथ भेदभाव की वास्तविक शिकायतें सामने आती रही हैं। इसलिए उनके लिए विशेष संरक्षण और संस्थागत तंत्र ज़रूरी है। दूसरी ओर सामान्य श्रेणी के छात्र और कई सामाजिक समूह यह कह रहे हैं कि नए नियम “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को सीमित कर देते हैं, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को वही अधिकार और सुरक्षा स्पष्ट रूप से नहीं मिलती।
असल सवाल यही है — क्या न्याय समूहों के आधार पर तय होना चाहिए, या इससे व्यापक !!
आज का भारत वह भारत नहीं है जहाँ हर सवर्ण संपन्न हो और हर आरक्षित वर्ग का छात्र असहाय। ज़मीनी सच्चाई कहीं अधिक जटिल है। आर्थिक रूप से कमजोर ब्राह्मण भी हैं, सामाजिक रूप से सशक्त ओबीसी भी, संघर्षरत एससी-एसटी छात्र भी, और विशेषाधिकार प्राप्त सामान्य वर्ग के विद्यार्थी भी। हर श्रेणी के भीतर हर प्रकार के लोग मौजूद हैं।
इसलिए यह मान लेना कि अन्याय केवल किसी एक वर्ग के साथ ही हो सकता है, आधुनिक समाज की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
संविधान ने ऐतिहासिक अन्याय को ध्यान में रखते हुए कुछ समुदायों के लिए विशेष प्रावधान किए — यह आवश्यक भी था। लेकिन साथ ही संविधान का मूल ढांचा व्यक्ति को केंद्र में रखता है। अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की बात करता है, अनुच्छेद 15 भेदभाव से रोकता है, और अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। ये अधिकार किसी एक श्रेणी के लिए नहीं, हर नागरिक के लिए हैं।
यहीं मौजूदा विवाद की जड़ है।
यदि कोई सामान्य श्रेणी का छात्र मानसिक उत्पीड़न झेलता है, अपमानित होता है, या उसे संस्थागत स्तर पर नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो क्या उसका दर्द कम वैध हो जाता है? क्या उसके पास शिकायत करने का उतना ही सशक्त तंत्र होना चाहिए या नहीं? लोकतंत्र का उत्तर साफ़ होना चाहिए — न्याय का अधिकार सबका है।
आज भेदभाव सिर्फ जाति तक सीमित नहीं रहा। आर्थिक स्थिति, भाषा, क्षेत्र, डिजिटल पहुँच, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सामाजिक नेटवर्क — ये सब नए विभाजक बन चुके हैं। विश्वविद्यालय परिसरों में असमानता बहु-स्तरीय है। ऐसे में केवल जाति के चश्मे से पूरे शैक्षणिक अनुभव को देखना अधूरा विश्लेषण होगा।
यह कहना भी ज़रूरी है कि आरक्षित वर्गों के खिलाफ भेदभाव की घटनाएँ वास्तविक हैं और उन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन समाधान “कुछ के लिए व्यवस्था, कुछ के लिए नहीं” में नहीं छिपा है। समाधान संतुलन में है।
शायद सही रास्ता “caste-exclusive” व्यवस्था नहीं, बल्कि “caste-sensitive” व्यवस्था है।
अर्थात — शिकायत का अधिकार हर छात्र के लिए खुला हो, लेकिन ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के मामलों में अतिरिक्त संवेदनशीलता और सतर्कता बरती जाए। जांच प्रक्रिया निष्पक्ष हो, झूठी शिकायतों के लिए भी स्पष्ट प्रावधान हों, और हर विद्यार्थी को यह भरोसा मिले कि उसकी बात सुनी जाएगी — चाहे वह किसी भी श्रेणी से हो।
सुप्रीम कोर्ट के सामने आज यही चुनौती है: सामाजिक न्याय और प्रक्रियागत न्याय के बीच संतुलन कैसे बने। संभव है अदालत नियमों को पूरी तरह खारिज न करे, बल्कि उन्हें अधिक समावेशी बनाने का रास्ता दिखाए ताकि वंचित वर्गों की सुरक्षा भी बनी रहे और कोई दूसरा वर्ग स्वयं को कानून से बाहर महसूस न करे।
दरअसल यह मामला केवल यूजीसी नियमों का नहीं है। यह उस भारत की दिशा तय करेगा जिसे हम बनाना चाहते हैं — जहाँ पहचान समूहों से तय होती है, या जहाँ व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि होती है।
आज किसी भी जाति के लोग पूरी तरह कमजोर या पूरी तरह सशक्त नहीं हैं। हर श्रेणी में संघर्षरत भी हैं और विशेषाधिकार प्राप्त भी। ऐसे समय में न्याय की व्यवस्था का केंद्र “जाति” नहीं, “मनुष्य” होना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली कसौटी है।
©️रेणु जुनेजा ✍️
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