Friday, March 20, 2026

सोनम वांगचुक की रिहाई

सोनम वांगचुक की रिहाई : 

लोकतंत्र, आंदोलन और सत्ता 

*समाधान बातचीत से ही *

                                   

हाल ही में लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक की रिहाई ने देश में एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी और रिहाई का प्रसंग नहीं है, बल्कि यह घटना लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों, राज्य की शक्ति, जनआंदोलनों की वैधता और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनेक प्रश्नों को एक साथ सामने ले आती है।

लद्दाख जैसे संवेदनशील और सामरिक क्षेत्र में यदि कोई आंदोलन खड़ा होता है, तो स्वाभाविक है कि सरकार उसे केवल सामाजिक दृष्टि से नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और प्रशासनिक स्थिरता के परिप्रेक्ष्य में भी देखती है। दूसरी ओर लोकतंत्र का मूल तत्व यह भी है कि नागरिकों को अपनी मांगें शांतिपूर्ण ढंग से उठाने का अधिकार हो।

ऐसे में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और बाद में हुई रिहाई दोनों को समझना आवश्यक है—कि इसमें क्या उचित था और क्या अनुचित।

लद्दाख का प्रश्न पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक विमर्श का विषय बना हुआ है। वर्ष 2019 में Article 370 के बाद जब लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो प्रारंभ में वहाँ के लोगों ने इसे एक ऐतिहासिक अवसर के रूप में देखा।

किन्तु समय के साथ यह प्रश्न उठने लगा कि बिना विधानसभा वाले इस ढाँचे में स्थानीय जनता की भागीदारी कितनी प्रभावी है। इसी संदर्भ में लद्दाख के कई सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने दो प्रमुख मांगें उठाईं—पहली, संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संवैधानिक संरक्षण; और दूसरी, राज्य का दर्जा।

सोनम वांगचुक इस आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक बनकर उभरे। शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में उनके लंबे कार्य ने उन्हें युवाओं और नागरिक समाज के बीच विश्वसनीयता प्रदान की । 

किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का पहला दायित्व कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा बनाए रखना होता है। लद्दाख की भौगोलिक स्थिति इसे और भी संवेदनशील बना देती है। इसकी सीमाएँ सीधे चीनऔर पाकिस्तान जैसे देशों से मिलती हैं।

सीमावर्ती क्षेत्रों में यदि बड़े स्तर पर आंदोलन या असंतोष उभरता है तो सरकार के लिए यह केवल सामाजिक प्रश्न नहीं रहता, बल्कि वह सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो जाता है। संभवतः इसी कारण प्रशासन ने कठोर कदम उठाते हुए उन्हें हिरासत में लिया।ऐसा प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है ।

सरकार के दृष्टिकोण से यह निर्णय एहतियाती माना जा सकता है, क्योंकि किसी भी संभावित अस्थिरता को रोकना उसकी प्राथमिकता होती है।

हालाँकि इस निर्णय ने कई महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाए। सोनम वांगचुक की पहचान एक शांतिपूर्ण सामाजिक कार्यकर्ता की रही है। वे लंबे समय से शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और हिमालयी पारिस्थितिकी के संरक्षण के लिए काम करते रहे हैं।

ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध कठोर कानूनी प्रावधानों का प्रयोग कई लोगों को असंगत लगा। लोकतंत्र में असहमति और विरोध को अपराध के रूप में देखने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। यदि कोई आंदोलन शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में हो, तो उसके साथ संवाद और परामर्श की प्रक्रिया अधिक उपयुक्त मानी जाती है।

यही कारण है कि उनकी गिरफ्तारी को कई नागरिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने लोकतांत्रिक मूल्यों के संदर्भ में  विरोध और आक्रोश  ने जन्म लिया । जो लाजिमी भी है । क्योंकि यदि हम सामाजिक कार्य करने वाले ,मीडिया में प्रश्न पूछने वालो पर गम्भीर आरोप लगा कर दण्डित करेंगे तो लोकतंत्र की रीढ़ ही नहीं बचेगी । लोकतंत्र में सवाल पूछने और अपना मत रखने पर सजा दिया जाना लोकतंत्र की हत्या है । इस लिए कोई भी गिरफ़्तारी राजनीतिक 

दबाव में नहीं होनी चाहिए ।

सोनम वांगचुक की रिहाई को कई लोग एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं। यह निर्णय यह दर्शाता है कि अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में संवाद का मार्ग ही सबसे प्रभावी होता है।

रिहाई से यह भी संकेत मिलता है कि सरकार और आंदोलनकारी पक्ष दोनों के लिए टकराव की राजनीति से आगे बढ़कर बातचीत का रास्ता तलाशना आवश्यक है।

लद्दाख का प्रश्न केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नहीं है। यह क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव यहाँ तेजी से दिखाई दे रहे हैं। स्थानीय समुदाय अपनी संस्कृति, भूमि और जीवन शैली को सुरक्षित रखने के प्रति स्वाभाविक रूप से चिंतित हैं।

इस पूरे प्रसंग को यदि संतुलित दृष्टि से देखा जाए तो कुछ बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं।

उचित यह है कि राज्य अपने संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए सतर्क रहे। किसी भी संभावित संकट को रोकना सरकार की जिम्मेदारी है।

किन्तु अनुचित यह प्रतीत होता है कि यदि कोई आंदोलन शांतिपूर्ण हो और उसकी मांगें संवैधानिक ढाँचे के भीतर हों, तो उसके प्रति कठोर दंडात्मक कदम उठाने से लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर हो सकता है।

लोकतंत्र की शक्ति केवल राज्य की क्षमता में नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास में निहित होती है। यह विश्वास तभी मजबूत रहता है जब असहमति को सम्मानजनक स्थान दिया जाता है।

सोनम वांगचुक की रिहाई केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह घटना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में संवाद और सहमति की संस्कृति को कैसे मजबूत किया जाए।

जनआंदोलनों को भी यह समझना होगा कि उनकी शक्ति संयम और रचनात्मकता में निहित है। वहीं सरकारों को यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र में विरोध को स्थान देना कमजोरी नहीं बल्कि परिपक्वता का संकेत है।

लद्दाख का प्रश्न अभी समाप्त नहीं हुआ है। संवैधानिक सुरक्षा, स्थानीय अधिकार और विकास की दिशा जैसे मुद्दे अभी भी चर्चा के विषय बने रहेंगे।

किन्तु यदि सोनम वांगचुक की रिहाई इस दिशा में संवाद और विश्वास का नया अध्याय खोलती है, तो इसे लोकतंत्र की एक सकारात्मक उपलब्धि माना जा सकता है।

भारत का लोकतंत्र तभी सशक्त रहेगा जब राज्य और समाज दोनों यह स्वीकार करें कि विचारों का मतभेद संघर्ष का कारण नहीं बल्कि समाधान की शुरुआत हो सकता है, और होना चाहिए । मुश्किलों के समाधान सदा 

बातचीत से सम्भव है दमन से नहीं ।मुद्दों और आवाजों का दमन लोकतंत्र और लोकतांत्रिक देशों नहीं होना चाहिए  

©️रेणु जुनेजा ✍️

Saturday, February 21, 2026

सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम

सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम


सिंगल मदर भी ‘पूर्ण अभिभावक’: नारी समानता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम



भारतीय समाज में परिवार को हमेशा से एक पवित्र और आवश्यक संस्था माना गया है। परंपरागत सोच में परिवार की परिकल्पना प्रायः “माता-पिता और संतान” के रूप में की जाती रही है, जहाँ पिता को संरक्षक और परिवार का मुखिया माना गया। किंतु समय के साथ सामाजिक संरचनाएँ बदली हैं—एकल परिवार बढ़े हैं, तलाक और अलगाव की घटनाएँ सामने आई हैं, विधवाओं और परित्यक्त महिलाओं की संख्या भी कम नहीं है। ऐसे में “सिंगल मदर” यानी अकेले अपने बच्चे का पालन-पोषण करने वाली माँ की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता थी।


हाल में न्यायपालिका द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि यदि कोई माँ अकेले अपने बच्चे का पालन-पोषण कर रही है, तो उसे “पूर्ण अभिभावक” (Full Guardian) के रूप में मान्यता मिल सकती है और बच्चे के दस्तावेज़ों से पिता का नाम हटाने या दर्ज न करने का अधिकार विशेष परिस्थितियों में दिया जा सकता है। यह निर्णय केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है—जो नारी समानता, गरिमा और आत्मनिर्भरता को स्वीकार करता है।





सिंगल मदर: एक सामाजिक यथार्थ



भारत में सिंगल मदर की स्थिति विविध कारणों से उत्पन्न होती है—पति का निधन, तलाक, अलगाव, घरेलू हिंसा, परित्याग, या विवाह के बिना मातृत्व का निर्णय। कई बार महिलाएँ सामाजिक दबाव, आर्थिक चुनौतियों और कानूनी उलझनों के बीच अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं। वे न केवल माँ की भूमिका निभाती हैं, बल्कि पिता की जिम्मेदारियाँ भी स्वयं संभालती हैं—आर्थिक, भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर।


इसके बावजूद, लंबे समय तक सरकारी दस्तावेज़ों, स्कूल रिकॉर्ड, पासपोर्ट, बैंक खाते या अन्य औपचारिक प्रक्रियाओं में पिता का नाम अनिवार्य रूप से माँगा जाता रहा। यह व्यवस्था अनजाने में सिंगल मदर्स और उनके बच्चों के लिए मानसिक पीड़ा और सामाजिक असहजता का कारण बनती थी। बच्चे को बार-बार यह समझाना पड़ता था कि उसके पिता क्यों उपस्थित नहीं हैं, और माँ को अपनी निजी परिस्थितियाँ सार्वजनिक करनी पड़ती थीं।





न्यायिक दृष्टिकोण: गरिमा और निजता का अधिकार



न्यायालय ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि किसी भी बच्चे की पहचान केवल पिता से नहीं जुड़ी होती। माँ भी समान रूप से अभिभावक है और संविधान ने उसे समान अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।


यदि कोई माँ यह साबित कर सके कि वह अकेले बच्चे की देखभाल कर रही है और पिता का उल्लेख बच्चे के हित में नहीं है—तो उसे अभिभावक के रूप में पूर्ण अधिकार मिलना चाहिए। यह निर्णय माँ की निजता (Right to Privacy) और गरिमा (Dignity) की रक्षा करता है।


यह मान्यता समाज को यह संदेश देती है कि मातृत्व किसी भी तरह से पितृत्व से कम नहीं है। यदि एक महिला अपने दम पर बच्चे का पालन-पोषण कर रही है, तो उसे किसी दूसरे नाम की आवश्यकता नहीं है अपनी पहचान स्थापित करने के लिए।





नारी समानता का आयाम



नारी समानता का अर्थ केवल शिक्षा या नौकरी में बराबरी नहीं है। यह उस मानसिक ढाँचे को बदलने की प्रक्रिया है जिसमें महिला को हमेशा किसी पुरुष के साथ जोड़ा जाता है—किसी की बेटी, पत्नी या माँ के रूप में। जब न्यायालय यह कहता है कि सिंगल मदर भी पूर्ण अभिभावक है, तो वह इस सोच को चुनौती देता है कि महिला अकेले अधूरी है।


यह निर्णय निम्नलिखित बिंदुओं पर नारी समानता को सुदृढ़ करता है—


  1. स्वायत्तता (Autonomy): महिला को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है—चाहे वह विवाह करे या न करे, मातृत्व स्वीकार करे या नहीं।
  2. कानूनी पहचान: माँ की पहचान स्वतंत्र रूप से मान्य है; उसे पिता के नाम के सहारे की आवश्यकता नहीं।
  3. सामाजिक सम्मान: सिंगल मदर होना कोई “अपूर्णता” नहीं, बल्कि साहस और जिम्मेदारी का प्रतीक है।
  4. बच्चे का हित सर्वोपरि: बच्चे की मानसिक शांति और गरिमा को प्राथमिकता दी गई है।






सामाजिक पूर्वाग्रह और चुनौतियाँ



हालाँकि न्यायालय का निर्णय प्रगतिशील है, परंतु समाज में मानसिक परिवर्तन अभी शेष है। कई स्थानों पर सिंगल मदर्स को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। उनकी नैतिकता पर प्रश्न उठाए जाते हैं, या उन्हें “बेचारी” समझा जाता है। यह दृष्टिकोण बदलना आवश्यक है।


शिक्षण संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में भी संवेदनशीलता का अभाव दिखता है। फॉर्म में अनिवार्य रूप से “पिता का नाम” भरने की शर्त, सिंगल मदर्स के लिए परेशानी का कारण बनती है। प्रशासनिक तंत्र को अब इस न्यायिक दृष्टिकोण के अनुरूप अपने नियमों में संशोधन करना होगा।





आर्थिक और मनोवैज्ञानिक पहलू



सिंगल मदर के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक स्थिरता होती है। वह अकेले कमाती है, घर संभालती है और बच्चे की शिक्षा-स्वास्थ्य की जिम्मेदारी उठाती है। कई बार उसे अतिरिक्त काम करना पड़ता है, जिससे मानसिक और शारीरिक थकान बढ़ती है।


बच्चे के लिए भी सामाजिक प्रश्नों का सामना करना आसान नहीं होता। स्कूल में साथियों के प्रश्न, रिश्तेदारों की जिज्ञासा—ये सब बच्चे के मन पर प्रभाव डाल सकते हैं। इसलिए परिवार और समाज का सहयोग आवश्यक है।


यदि समाज सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाए, तो सिंगल मदर और उसका बच्चा आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सकते हैं। 

बदलती पारिवारिक संरचना और नई सोच



आज के समय में परिवार की परिभाषा बदल रही है। एकल अभिभावक परिवार, दत्तक ग्रहण, सरोगेसी, और विवाह के बिना मातृत्व—ये सब आधुनिक समाज की वास्तविकताएँ हैं। कानून और समाज को इन परिवर्तनों को स्वीकार करना होगा।


जब हम कहते हैं कि “माँ ही प्रथम गुरु है”, तो हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि वह अकेले भी अपने बच्चे को संस्कार, शिक्षा और आत्मबल दे सकती है।


यह निर्णय यह भी दर्शाता है कि पितृसत्तात्मक सोच अब धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। महिला केवल सहायक भूमिका में नहीं, बल्कि नेतृत्व के और निर्णायक भूमिका में भी है।


शिक्षा और जागरूकता की भूमिका


नारी समानता को व्यवहार में लाने के लिए केवल न्यायिक आदेश पर्याप्त नहीं हैं। समाज में व्यापक जागरूकता अभियान की आवश्यकता है।


  • स्कूलों में संवेदनशीलता पर आधारित शिक्षा दी जाए।
  • सरकारी फॉर्म और नीतियों में “अभिभावक 1” और “अभिभावक 2” जैसे विकल्प दिए जाएँ।
  • मीडिया सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करे, जहाँ सिंगल मदर को सशक्त रूप में दिखाया जाए । 

आप स्वयं एक मीडिया विशेषज्ञ रही हैं, इसलिए भली-भाँति जानती हैं कि जनसंचार माध्यम सामाजिक सोच को दिशा देने में कितना प्रभावशाली होते हैं। यदि मीडिया सिंगल मदर को संघर्षशील, आत्मनिर्भर और सम्माननीय रूप में प्रस्तुत करे, तो समाज में स्वीकार्यता बढ़ेगी। 



संवैधानिक मूल्यों की पुनर्पुष्टि

यह निर्णय भारतीय संविधान की आत्मा को पुनः स्थापित करता है। समानता, गरिमा और स्वतंत्रता—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आधारशिला हैं।

जब एक महिला अपने बच्चे के लिए पूर्ण अभिभावक मानी जाती है, तो यह संविधान की उस भावना को साकार करता है जिसमें नागरिक की पहचान उसके लिंग से परे होती है।

यह भी स्पष्ट होता है कि कानून अब समाज के बदलते स्वरूप के साथ कदम मिला रहा है।


आगे की राह

यद्यपि यह निर्णय ऐतिहासिक है, फिर भी कुछ कदम और आवश्यक हैं—

  1. सभी राज्यों में एक समान दिशानिर्देश लागू हों।
  2. सरकारी विभागों में प्रशिक्षण दिया जाए ताकि सिंगल मदर्स को अनावश्यक कागजी परेशानियों का सामना न करना पड़े।
  3. सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में सिंगल मदर्स को विशेष सहायता दी जाए।
  4. मानसिक स्वास्थ्य परामर्श और सपोर्ट समूह विकसित किए जाएँ।

सिंगल मदर को “पूर्ण अभिभावक” की मान्यता मिलना केवल एक महिला की जीत नहीं, बल्कि समूची नारी जाति की गरिमा का सम्मान है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि मातृत्व किसी भी सामाजिक ढाँचे से परे एक पूर्ण और सशक्त पहचान है।

नारी समानता का अर्थ है—महिला को उसके निर्णयों, उसकी परिस्थितियों और उसकी क्षमता के आधार पर स्वीकार करना। जब समाज यह स्वीकार कर लेगा कि एक माँ अकेले भी संपूर्ण है, तभी वास्तविक समानता संभव होगी।

आज आवश्यकता है कि हम सिंगल मदर्स को सहानुभूति नहीं, सम्मान दें; दया नहीं, अधिकार दें; प्रश्न नहीं, सहयोग दें। तभी हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर सकेंगे जहाँ हर महिला—चाहे वह विवाहित हो, अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा—अपनी पहचान और अपने अधिकारों के साथ गरिमापूर्ण जीवन जी सके।

यह निर्णय भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक संदेश है, कि समानता केवल सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारा जाने वाला सत्य है। और जब यह सत्य समाज में स्थापित होगा, तभी भारत सचमुच एक समतामूलक राष्ट्र कहलाएगा।

©️रेणु जुनेजा ✍️

Thursday, February 12, 2026

भारत की राष्ट्रीय नीति

(विशेष लेख)


विश्व राजनीति के दबाव और भारत की राष्ट्रीय नीति: संतुलन की कठिन परीक्षा 


इक्कीसवीं सदी की राजनीति केवल सीमाओं की राजनीति नहीं रह गई है। आज विश्व के किसी कोने में घटने वाली घटना भारत की संसद, बाज़ार और आम नागरिक की रसोई तक असर डालती है। ऐसे समय में यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्व राजनीति भारत की राष्ट्रीय नीति को किस तरह प्रभावित कर रही है, और भारत इन दबावों का सामना किस सोच के साथ कर रहा है।

बदलती विश्व व्यवस्था: स्थिरता का भ्रम टूट चुका है

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस स्थिर विश्व की कल्पना की गई थी, वह अब इतिहास बन चुकी है। आज की विश्व राजनीति बहुध्रुवीय है, जहाँ हर शक्ति अपने हितों को सर्वोपरि रख रही है।

अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक व्यापार और तकनीक को दो खेमों में बाँट दिया है। रूस–यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संस्थाएँ सैन्य शक्ति के आगे अक्सर असहाय हो जाती हैं। मध्य-पूर्व की लगातार अस्थिरता ने ऊर्जा सुरक्षा को वैश्विक संकट बना दिया है।

यह सब केवल दूर की खबरें नहीं हैं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय नीति के लिए सीधी चुनौतियाँ हैं।

आर्थिक दबाव: जब युद्ध महँगाई बनकर घर में घुस आता है

रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह आर्थिक चेतावनी थी। महँगाई बढ़ी, परिवहन महँगा हुआ और आम आदमी की थाली प्रभावित हुई।

भारत की राष्ट्रीय नीति का यहाँ व्यावहारिक पक्ष सामने आया। सरकार ने सैद्धांतिक रुख़ छोड़कर रूस से सस्ता तेल खरीदा, जिससे घरेलू बाज़ार को राहत मिली। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश बढ़ाकर भविष्य की निर्भरता कम करने की कोशिश की गई। यह उदाहरण दिखाता है कि आज की राष्ट्रीय नीति भावनाओं से नहीं, ज़रूरतों से संचालित होती है।

सुरक्षा और भू-राजनीति: सीमा से संसद तक असर

चीन के साथ सीमा तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ भारत की सुरक्षा नीति के केंद्र में हैं। रक्षा बजट में वृद्धि, स्वदेशी हथियार निर्माण और रणनीतिक साझेदारियाँ—ये सभी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की प्रतिक्रिया हैं।

क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता यह संकेत देती है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह राष्ट्रीय नीति का वह मोड़ है जहाँ कूटनीति और सैन्य तैयारी साथ-साथ चलती हैं।

रणनीतिक स्वायत्तता: दबावों के बीच निर्णय की आज़ादी

अमेरिका और यूरोप चाहते हैं कि भारत वैश्विक विवादों में स्पष्ट पक्ष ले, जबकि रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार रहा है। ऐसे दबावों में भारत ने किसी भी गुट का स्थायी सदस्य बनने से इंकार किया।

“रणनीतिक स्वायत्तता” भारत की राष्ट्रीय नीति की रीढ़ बन चुकी है। यह नीति भारत को निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है और बताती है कि राष्ट्रीय हित किसी वैश्विक दबाव से ऊपर हैं।

जलवायु राजनीति: नैतिकता बनाम यथार्थ

जलवायु परिवर्तन आज विश्व राजनीति का नैतिक प्रश्न बना दिया गया है, लेकिन इसका बोझ अक्सर विकासशील देशों पर डाला जाता है। भारत ने स्पष्ट कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में है, पर विकास और रोज़गार की कीमत पर नहीं।

अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश यह दिखाता है कि भारत समाधान का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन असमान वैश्विक जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं करता।

राष्ट्रीय राजनीति में वैश्विक विमर्श

आज भारत की राष्ट्रीय राजनीति में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिली सफलता चुनावी मुद्दा बनती है। जी-20 की अध्यक्षता हो या वैश्विक बैठकों में भारत की भूमिका—इन सबको राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा जाता है।

विपक्ष इन नीतियों के दीर्घकालिक परिणामों पर सवाल उठाता है। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है, जहाँ वैश्विक मुद्दे घरेलू बहस का हिस्सा बनते हैं।

मीडिया और जनचेतना: सबसे बड़ी जिम्मेदारी

मीडिया यदि विश्व राजनीति को केवल राष्ट्रवादी उत्तेजना के रूप में पेश करता है, तो समझ की जगह शोर पैदा होता है। विशेष लेखन का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह भावनाओं के पार जाकर तथ्यों और प्रभावों को सामने रखे।

जनसामान्य जितना समझदार होगा, राष्ट्रीय नीति उतनी ही मज़बूत होगी।

संतुलन ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति

विश्व राजनीति के इस अस्थिर दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—संतुलन बनाए रखना।

न तो आँख मूँदकर किसी वैश्विक शक्ति के पीछे चलना, न ही दुनिया से कटकर आत्मनिर्भरता का भ्रम पालना।

एक दूरदर्शी, व्यावहारिक और जनहित आधारित राष्ट्रीय नीति ही भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान और देश के भीतर स्थिरता दे सकती है।

भारत की असली परीक्षा यही है—दबावों में झुकना नहीं, और अवसरों को पहचानना।

©️रेणु जुनेजा ✍️

सोनम वांगचुक की रिहाई

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