(विशेष लेख)
विश्व राजनीति के दबाव और भारत की राष्ट्रीय नीति: संतुलन की कठिन परीक्षा
इक्कीसवीं सदी की राजनीति केवल सीमाओं की राजनीति नहीं रह गई है। आज विश्व के किसी कोने में घटने वाली घटना भारत की संसद, बाज़ार और आम नागरिक की रसोई तक असर डालती है। ऐसे समय में यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्व राजनीति भारत की राष्ट्रीय नीति को किस तरह प्रभावित कर रही है, और भारत इन दबावों का सामना किस सोच के साथ कर रहा है।
बदलती विश्व व्यवस्था: स्थिरता का भ्रम टूट चुका है
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद जिस स्थिर विश्व की कल्पना की गई थी, वह अब इतिहास बन चुकी है। आज की विश्व राजनीति बहुध्रुवीय है, जहाँ हर शक्ति अपने हितों को सर्वोपरि रख रही है।
अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक व्यापार और तकनीक को दो खेमों में बाँट दिया है। रूस–यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून और संस्थाएँ सैन्य शक्ति के आगे अक्सर असहाय हो जाती हैं। मध्य-पूर्व की लगातार अस्थिरता ने ऊर्जा सुरक्षा को वैश्विक संकट बना दिया है।
यह सब केवल दूर की खबरें नहीं हैं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय नीति के लिए सीधी चुनौतियाँ हैं।
आर्थिक दबाव: जब युद्ध महँगाई बनकर घर में घुस आता है
रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया। भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह आर्थिक चेतावनी थी। महँगाई बढ़ी, परिवहन महँगा हुआ और आम आदमी की थाली प्रभावित हुई।
भारत की राष्ट्रीय नीति का यहाँ व्यावहारिक पक्ष सामने आया। सरकार ने सैद्धांतिक रुख़ छोड़कर रूस से सस्ता तेल खरीदा, जिससे घरेलू बाज़ार को राहत मिली। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा पर निवेश बढ़ाकर भविष्य की निर्भरता कम करने की कोशिश की गई। यह उदाहरण दिखाता है कि आज की राष्ट्रीय नीति भावनाओं से नहीं, ज़रूरतों से संचालित होती है।
सुरक्षा और भू-राजनीति: सीमा से संसद तक असर
चीन के साथ सीमा तनाव और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियाँ भारत की सुरक्षा नीति के केंद्र में हैं। रक्षा बजट में वृद्धि, स्वदेशी हथियार निर्माण और रणनीतिक साझेदारियाँ—ये सभी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की प्रतिक्रिया हैं।
क्वाड जैसे मंचों पर भारत की सक्रियता यह संकेत देती है कि भारत अब केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यह राष्ट्रीय नीति का वह मोड़ है जहाँ कूटनीति और सैन्य तैयारी साथ-साथ चलती हैं।
रणनीतिक स्वायत्तता: दबावों के बीच निर्णय की आज़ादी
अमेरिका और यूरोप चाहते हैं कि भारत वैश्विक विवादों में स्पष्ट पक्ष ले, जबकि रूस भारत का पुराना रणनीतिक साझेदार रहा है। ऐसे दबावों में भारत ने किसी भी गुट का स्थायी सदस्य बनने से इंकार किया।
“रणनीतिक स्वायत्तता” भारत की राष्ट्रीय नीति की रीढ़ बन चुकी है। यह नीति भारत को निर्णय लेने की स्वतंत्रता देती है और बताती है कि राष्ट्रीय हित किसी वैश्विक दबाव से ऊपर हैं।
जलवायु राजनीति: नैतिकता बनाम यथार्थ
जलवायु परिवर्तन आज विश्व राजनीति का नैतिक प्रश्न बना दिया गया है, लेकिन इसका बोझ अक्सर विकासशील देशों पर डाला जाता है। भारत ने स्पष्ट कहा है कि वह पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में है, पर विकास और रोज़गार की कीमत पर नहीं।
अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश यह दिखाता है कि भारत समाधान का हिस्सा बनना चाहता है, लेकिन असमान वैश्विक जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं करता।
राष्ट्रीय राजनीति में वैश्विक विमर्श
आज भारत की राष्ट्रीय राजनीति में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिली सफलता चुनावी मुद्दा बनती है। जी-20 की अध्यक्षता हो या वैश्विक बैठकों में भारत की भूमिका—इन सबको राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा जाता है।
विपक्ष इन नीतियों के दीर्घकालिक परिणामों पर सवाल उठाता है। यही लोकतंत्र की परिपक्वता है, जहाँ वैश्विक मुद्दे घरेलू बहस का हिस्सा बनते हैं।
मीडिया और जनचेतना: सबसे बड़ी जिम्मेदारी
मीडिया यदि विश्व राजनीति को केवल राष्ट्रवादी उत्तेजना के रूप में पेश करता है, तो समझ की जगह शोर पैदा होता है। विशेष लेखन का उद्देश्य यही होना चाहिए कि वह भावनाओं के पार जाकर तथ्यों और प्रभावों को सामने रखे।
जनसामान्य जितना समझदार होगा, राष्ट्रीय नीति उतनी ही मज़बूत होगी।
संतुलन ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति
विश्व राजनीति के इस अस्थिर दौर में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—संतुलन बनाए रखना।
न तो आँख मूँदकर किसी वैश्विक शक्ति के पीछे चलना, न ही दुनिया से कटकर आत्मनिर्भरता का भ्रम पालना।
एक दूरदर्शी, व्यावहारिक और जनहित आधारित राष्ट्रीय नीति ही भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान और देश के भीतर स्थिरता दे सकती है।
भारत की असली परीक्षा यही है—दबावों में झुकना नहीं, और अवसरों को पहचानना।
©️रेणु जुनेजा ✍️
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