बेकल उत्साही
प्रसिद्ध शायर बेकल उत्साही का इंतक़ाल साहित्य जगत के लिये अपूरणीय क्षति है।
बेकल उत्साही साहित्य जगत के एक चमकते बेबाक़ सितारे थे। बेकलउत्साही उनका उपनाम था।
आपका पूरा नाम मोहम्मद शफ़ी खान था।आपका जन्म एक जून १९२८में ग्राम ग़ौर राम पुरा में हुआ था।
आपके पिता शफ़ी मोहम्मद जफर थे।आपके उपनाम की अलग कहानी है।
१९५२में पण्डित नेहरु ने एक कार्यक्रम में
आपका काव्यपाठ सुनकरदिया था।
साहित्यिक योगदान
आपकी मुख्यप्रकाशित साहित्य में
बापू का सपना
नग्मा औ तरन्नुम
सरुरे जाविदाँ
पुरवाईयां
निशाने ज़िन्दगी
विजय बिगुल
चहके बगिया महके गीत
कोमल मुखड़े बेकल गीत
अपनी धरती चाँद का दर्पण
ग़ज़लसांवरी
रंग हज़ारों ख़ुशबू एक
मिट्टी , रेत, चट्टान
अन्जुरी भर आन्दोलन
ग़ज़ल गंगा
धरती सदा सुहागिन।
लफ्जोंकी घटायें इत्यादि प्रमुख हैं। आपको दो दर्जन साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया ।
१९४६ में पद्म श्री से अंलकृत , १९५५ में राष्ट्पति सम्मान द्वारा सम्मानित किया गया।
मैं सुदामा प्यार का , प्यार द्वारिका नाथ
प्यासे दोनों नयन हैं , भूखे दोनों हाथ ।
मैं तुलसी का वंश हूँ, अवध पुरी है धाम ।
साँस साँस गीता बसी रोम रोम राम,
धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्म स्थान।
अपने मन मैं करुं, मैं कैसा इंसान ।
भाव सुभाव के पाठ में ,मैं अक्षर अनमोल,
नबी मेरा इतिहास है, कृष्ण मेरा भूगोल ।
होली डूबी रंग में ,ईद हुई पोशाक
मानवता विजयी हुई नफ़रत हो गयी ख़ाक।
ये है बेकल उत्साही।
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