मुशि्कलों को जो खे रही ,उस मां का श्रृंगार बनों,
जीवन की मुशि्कलों से लडकर , तुम जीवन का आधार बनों.
खे रही जो मुश्किलों से , उस भगनी का रूप श्रृंगार बनों,
जूझ रही जो कश्ती मंझधार में,उस कश्ती की पतवार बनों.
सोनम वांगचुक की रिहाई : लोकतंत्र, आंदोलन और सत्ता *समाधान बातचीत से ही * हाल ही में लद्दाख के प्रसि...
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